Breaking

Thursday, 16 August 2018

August 16, 2018

Constitution of India ||


Constitution of India 




०  13 दिसंबर 1946 को पंडित नेहरू ने सभा में ऐतिहासिक उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया| इस में संविधान एक श्रंखला के ढांचे एवं दर्शन की छलकती इसमें कहा गया
०  यह संविधान सभा भारत को एक स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य घोषित करती है तथा अपने भविष्य के प्रशासन को चलाने के लिए एक संविधान के निर्माण की घोषणा करती है|
०  ब्रिटिश भारत में शामिल सभी क्षेत्र भारतीय राज्यों में शामिल सभी क्षेत्र तथा भारत से बाहर के इस प्रकार के सभी क्षेत्र तथा वे अपने क्षेत्र जो इसमें शामिल होना चाहेंगे भारतीय संघ का हिस्सा होंगे|
०  उक्त वर्णित सभी क्षेत्रों तथा उनकी सीमाओं का निर्धारण संविधान सभा द्वारा किया जाएगा तथा इसके लिए उपरांत के नियमों के अनुसार यदि वे चाहेंगे तो उनके अवशिष्ट शक्तियां उनमें निहित रहेगी तथा प्रशासन के संचालन के लिए भी वे सभी शक्तियां केवल उनको छोड़कर जो सम्मिलित होगी इन राज्यों को प्राप्त होगी|
०  संप्रभु स्वतंत्र भारत की सभी शक्तियां एवं प्राधिकार इसके अभिन्न अंग तथा सरकार के अंग सभी का स्त्रोत भारत की जनता होगी|
०  भारत के सभी लोगों के लिए न्याय सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता एवं शिक्षा अवसर की समता विधि के समक्ष समता विचार एवं अभिव्यक्ति विश्वास ब्राह्मण संगठन बनाने अधिक स्वतंत्रता तथा लोक नैतिकता की स्थापना सुनिश्चित की जाएगी|
०  अल्पसंख्यकों पिछड़े वर्गों तथा जनजातीय क्षेत्रों के लोगों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की जाएगी|
०  संघ की एकता को अक्षुण्ण बनाए रखा जाएगा तथा इसके क्षेत्र समुंद्र एवं भाइयों क्षेत्र को सभ्य देश के न्याय एवं विधि के अनुरूप सुरक्षा प्रदान की जाएगी॥
०  इस प्राचीन भूमि को विश्व में उसका अधिकार एवं उचित स्थान दिलाया जाएगा तथा विश्व शांति एवं मानव कल्याण को बढ़ावा देने के निर्मित उसके योगदान को सुनिश्चित किया जाएगा|
०  इस प्रस्ताव को 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया इसके सविधान के स्वरूप को काफी हद तक प्रभावित किया
संविधान के निर्माण और आम कानूनों को लागू करने के अलावा संविधान सभा में निम्न कार्य भी किए
०  इसने मई 1949 में राष्ट्रमंडल में भारत की सदस्यता का स्थापन किया
०  इसने 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया
०  इसमें 24 जनवरी 1950 को राष्ट्रीय गान को अपनाया
०  इसने 24 जनवरी 1950 को राष्ट्रीय गीत को अपनाया
०  इसने 24 जनवरी 1950 को डॉ राजेंद्र प्रसाद को भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में चुना
2 साल 11 माह और 18 दिनों में विधानसभा की कुल 11 बैठकें ताओं ने लगभग 7 देशों के संविधानों का अवलोकन किया और इसके प्रारूप पर 114 दिनों तक विचार हुआ संविधान के निर्माण पर कुल 6400000 रुपए का खर्च आया

Monday, 6 August 2018

August 06, 2018

motivational stories

motivational stories

motivational stories>>दिल को छू जानेवाली कहानियां -> माँ और बेटा

 storyline online  >> बेटा: हेलो. माँ में तुम्हारा बेटा बोल रहा हू. `कैसी हो माँ?` माँ: में ….. में …. ठीक हू बेटा….. यह बताओ तुम और बहू दोनो कैसे हो? बेटा: हम दोनो ठीक है… माँ आप की बहुत याद आती है?… अछा सुनो माँ, में अगले महीने इंडिया आ रहा हू….. तुम्हे लेने. माँ: क्या? बेटा: हाँ माँ… अब हम सब साथ में रहे गई…. तुम्हारी बहू कह रही थी.. माँ को अमेरिका ले आओ, वाहा अकेली बहुत परेशान हो रही होगी. हेलो…. सुन रही हो ना माँ….? माँ: हाँ.. हाँ बेटे… `माँ की आखों से आँसू बहने लगी…. बेटे और बहू का प्यार नस नस में दौड़ने लगा” `पूरे 5 साल बाद घर आने वाला था” बेटा अकेले आया था… बेटा: माँ हुमे जल्दी ही वापिस जाना है. एसलिए जो भी पैसा किसी से लेना है वो लेकर रख लो. और तब तक में किसी प्रॉपर्टी डीलर से मकान(घर) की बात करता हू. 


  मा: मकान….??? बेटा: हा माँ, अब यह मकान बेचना पड़ेगा.. वरना कौन इसकी देख भाल करेगा. हम सब तो अब अमेरिका में रहेंगे. `बेटे ने कम पैसों में ही मकान को बेच दिया.” एरपोर्ट पर बेटा: माँ तुम यहा बैठो में अंदर जाकर समान को चेक और बोरडिंग और वीसा का काम निपटा कर आता हू. माँ: ठीक है बेटे… `काफ़ी समय बीट गया.” एरपोर्ट कर्मचारी: ”माजी… किस से मिलना है.” माँ: मेरा बेटा अंदर टिकेट लेने गया है. हम आज अमेरिका जा रहे है. एरपोर्ट कर्मचारी: लेकिन अंदर तो कोई भी नही है, अमेरिका जाने वाली सभी फ्लाइट्स दोपहर में ही चली गयी. `कर्मचारी अंदर गया और कुछ देर बाद बाहर आ कर बोला” कर्मचारी: माजी आपका बेटा तो अमेरिका जाने वाली फ्लाइट से कब का जा चुका है. `बूढ़ी माँ की आखों से आँसू आ गये” किसी तरह वो वापिस घर पहुचि, जो की अब बिक चक्का था. रात में वो घर के बाहर एक रोड के फुटपॅत पर ही सो गयी. सुबह हुई तो एक दयालु मकान मलिक ने एक कमरा रहने को दे दिया. moral stories , small moral stories for kids


  पति की पेंसन से घर का किराया और खाने का काम चलने लगा. समय गुजरने लगा. एक दिन मकान मलिक: माजी … क्यू नही आप अपने किसी रिस्तेदार के यहा चली जाए. अब आप की उमर बहुत हो चुकी है. अकेली कब तक रह पावगी. माँ: हाँ, चली तो जाउ , लेकिन कल को मेरा बेटा आया तो…? यहा फिर कौन उसका ख्याल कौन रखेगा? इतना कह कर उसकी आखों से आँसू आने लगे. अगर आपको अच्छा लगा तो कृपया कॉमेंट कीजिए।  ऐसी ही motivational stories   के लिए पढ़ते रहिए skcreaters.blogspot.com

Sunday, 5 August 2018

August 05, 2018

Moral story

Moral story

दिल को छू जानेवाली कहानियां -> विश्वास रखो !

दिल को छू जानेवाली कहानियां -> विश्वास रखो !

 एक अमीर आदमी था। उसने समुद्र मेँ अकेले घूमने के लिए एक नाव बनवाई।

छुट्टी के दिन वह नाव लेकर समुद्र की सैर करने निकला। आधे समुद्र तक पहुंचा ही था कि अचानक एक जोरदार तूफान आया। उसकी नाव पुरी तरह से तहस-नहस हो गई लेकिन वह लाईफ जैकेट की मदद से समुद्र मेँ कुद गया। जब तूफान शांत हुआ तब वह तैरता तैरता एक टापू पर पहुंचा लेकिन वहाँ भी कोई नही था। टापू के चारोँ ओर समुद्र के अलावा कुछ भी नजर नही आ रहा था। उस आदमी ने सोचा कि जब मैंने पूरी जिदंगी मेँ किसी का कभी भी बुरा नही किया तो मेरे साथ ऐसा क्यूँ हुआ..???

उस आदमी को लगा कि भगवान ने मौत से बचाया तो आगे का रास्ता भी भगवान ही बताएगा। धीरे धीरे वह वहाँ पर उगे झाड-पत्ते खाकर दिन बिताने लगा। अब धीरे-धीरे उसकी श्रध्दा टूटने लगी,भगवान पर से उसका विश्वास उठ गया। उसको लगा कि इस दुनिया मेँ भगवान है ही नही। फिर उसने सोचा कि अब पूरी जिंदगी यही इस टापू पर ही बितानी है तो क्यूँ ना एक झोपडी बना लूँ ……??

फिर उसने झाड की डालियो और पत्तो से एक छोटी सी झोपडी बनाई। उसने मन ही मन कहा कि आज से झोपडी मेँ सोने को मिलेगा आज से बाहर नही सोना पडेगा। रात हुई ही थी कि अचानक मौसम बदला बिजलियाँ जोर जोर से कड़कने लगी.! तभी अचानक एक बिजली उस झोपडी पर आ गिरी और झोपडी धधकते हुए जलने लगी। यह देखकर वह आदमी टूट गया आसमान की तरफ देखकर बोला तू भगवान नही, राक्षस है।

तुझमे दया जैसा कुछ है ही नही तू बहुत क्रूर है! वह व्यक्ति हताश होकर सर पर हाथ रखकर रो रहा था। कि अचानक एक नाव टापू के पास आई। नाव से उतरकर दो आदमी बाहर आये और बोले कि हम तुम्हेँ बचाने आये हैं। दूर से इस वीरान टापू मे जलता हुआ झोपडा देखा तो लगा कि कोई उस टापू पर मुसीबत मेँ है।

अगर तुम अपनी झोपडी नही जलाते तो हमे पता नही चलता कि टापू पर कोई है।

उस आदमी की आँखो से आँसू गिरने लगे। उसने ईश्वर से माफी माँगी और बोला कि मुझे क्या पता कि आपने मुझे बचाने के लिए मेरी झोपडी जलाई थी।
=============================================
Moral – दिन चाहे सुख के हों या दुख के, भगवान अपने भक्तों के साथ हमेशा रहते हैं
August 05, 2018

Panchtantra ki kahani

Panchtantra ki kahani

पंचतंत्र की कहानियां -> बिल्ली का न्याय

 kahaniya in hindi  एक वन में एक पेड की खोह में एक चकोर रहता था। उसी पेड के आस-पास कई पेड और थे, जिन पर फल व बीज उगते थे। उन फलों और बीजों से पेट भरकर चकोर मस्त पडा रहता। इसी प्रकार कई वर्ष बीत गए। एक दिन उडते-उडते एक और चकोर सांस लेने के लिए उस पेड की टहनी पर बैठा। दोनों में बातें हुईं। दूसरे चकोर को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वह केवल वह केवल पेडों के फल व बीज चुगकर जीवन गुजार रहा था । दूसरे ने उसे बताया- “भई, दुनिया में खाने के लिए केवल फल और बीज ही नहीं होते और भी कई स्वादिष्ट चीजें हैं । उन्हें भी खाना चाहिए। खेतों में उगने वाले अनाज तो बेजोड होते हैं। कभी अपने खाने का स्वाद बदलकर तो देखो।”panchatantra
दूसरे चकोर के उडने के बाद वह चकोर सोच में पड गया। उसने फैसला किया कि कल ही वह दूर नजर आने वाले खेतों की ओर जाएगा और उस अनाज नाम की चीज का स्वाद चखकर देखेग।panchatantra stories

दूसरे दिन चकोर उडकर एक खेत के पास उतरा। खेत में धान की फसल उगी थी। चकोर ने कोंपलें खाई। उसे वह अति स्वादिष्ट लगीं। उस दिन के भोजन में उसे इतना आनंद आया कि खाकर तॄप्त होकर वहीं आखें मूंदकर सो गया। इसके बाद भी वह वहीं पडा रहा। रोज खाता-पीता और सो जाता। छः – सात दिन बाद उसे सुध आई कि घर लौटना चाहिए।panchtantra ki kahaniya  

इस बीच एक खरगोश घर की तलाश में घूम रहा था। उस इलाके में जमीन के नीचे पानी भरने के कारण उसका बिल नष्ट हो गया था। वह उसी चकोर वाले पेड के पास आया और उसे खाली पाकर उसने उस पर अधिकार जमा लिया और वहां रहने लगा। जब चकोर वापस लौटा तो उसने पाया कि उसके घर पर तो किसी और का कब्जा हो गया हैं। चकोर क्रोधित होकर बोला – “ऐ भाई, तू कौन हैं और मेरे घर में क्या कर रहा हैं?”panchatantra

खरगोश ने दांत दिखाकर कहा – “मैं इस घर का मालिक हूं। मैं सात दिन से यहां रह रहा हूं, यह घर मेरा हैं।”

चकोर गुस्से से फट पडा – “सात दिन! भाई, मैं इस खोह में कई वर्षो से रह रहा हूं। किसी भी आस-पास के पंछी या चौपाए से पूछ ले।”

खरगोश चकोर की बाटह् काटता हुआ बोला- “सीधी-सी बात हैं। मैं यहां आया। यह खोह खाली पडी थी और मैं यहां बस गय मैं क्यों अब पडोसियों से पूछता फिरुं?”

चकोर गुस्से में बोला- “वाह! कोई घर खाली मिले तो इसका यह मतलब हुआ कि उसमें कोई नहीं रहता? मैं आखिरी बार कह रहा हूं कि शराफत से मेरा घर खाली कर दे वर्ना…।”

खरगोश ने भी उसे ललकारा- “वर्ना तू क्या कर लेगा? यह घर मेरा हैं। तुझे जो करना हैं, कर ले।”

चकोर सहम गया। वह मदद और न्याय की फरीयाद लेकर पडोसी जानवरों के पास गया सबने दिखावे की हूं-हूं की, परन्तु ठोस रुप से कोई सहायता करने सामने नहीं आया।

एक बूढे पडोसी ने कहा – “ज्यादा झगडा बढाना ठीक नहीं होगा । तुम दोनों आपस में कोई समझौता कर लो।” पर समझौते की कोई सूरत नजर नहीं आ रही थी, क्योंकि खरगोश किसी शर्त पर खोह छोडने को तैयार नहीं था। अंत में लोमडी ने उन्हें सलाह दी – “तुम दोनों किसी ज्ञानी-ध्यानी को पंच बनाकर अपने झगडे का फैसला उससे करवाओ।”

दोनों को यह सुझाव पसंद आया। अब दोनों पंच की तलाश में इधर-उधर घूमने लगे। इसी प्रकार घूमते-घूमते वे दोनों एक दिन गंगा किनारे आ निकले। वहां उन्हें जप तप में मग्न एक बिल्ली नजर आई। बिल्ली के माथे पर तिलक था। गले में जनेऊ और हाथ में माला लिए मॄगछाल पर बैठी वह पूरी तपस्विनी लग रही ती। उसे देखकर चकोर व खरगोश खुशी से उछल पडे। उन्हें भला इससे अच्छा ज्ञानी-ध्यानी कहां मिलेगा। खरगोश ने कहा – “चकोर जी, क्यों न हम इससे अपने झगडे का फैसला करवाएं?”

चकोर पर भी बिल्ली का अच्छा प्रभाव पडा था। पर वह जरा घबराया हुआ था। चकोर बोला -”मुझे कोई आपत्ति नही है पर हमें जरा सावधान रहना चाहिए।” खरगोश पर तो बिल्ली का जादू चल गया था। उसने कहा-”अरे नहीं! देखते नहीं हो, यह बिल्ली सांसारिक मोह-माया त्यागकर तपस्विनी बन गई हैं।”

सच्चाई तो यह थी कि बिल्ली उन जैसे मूर्ख जीवों को फांसने के लिए ही भक्ति का नाटक कर रही थी। फिर चकोर और खरगोश पर और प्रभाव डालने के लिए वह जोर-जोर से मंत्र पडने लगी। खरगोश और चकोर ने उसके निकट आकर हाथ जोडकर जयकारा लगाया -”जय माता दी। माता को प्रणाम।”

बिल्ली ने मुस्कुराते हुए धीरे से अपनी आंखे खोली और आर्शीवाद दिया -”आयुष्मान भव, तुम दोनों के चहरों पर चिंता की लकेरें हैं। क्या कष्ट हैं तुम्हें, बच्चो?”

चकोर ने विनती की -”माता हम दोनों के बीच एक झगडा हैं। हम चाहते हैं कि आप उसका फैसला करें।”

बिल्ली ने पलकें झपकाईं -”हरे राम, हरे राम! तुम्हें झगडना नहीं चाहिए। प्रेम और शांति से रहो।” उसने उपदेश दिया और बोली -”खैर, बताओ, तुम्हारा झगडा क्या है?”

चकोर ने मामला बताया। खरगोश ने अपनी बात कहने के लिए मुंह खोला ही था कि बिल्ली ने पंजा उठाकर रोका और बोली “बच्चो, मैं काफी बूढी हूं ठीक से सुनाई नहीं देता। आंखे भी कमजोर हैं इसलिए तुम दोनों मेरे निकट आकर मेरे कान में जोर से अपनी-अपनी बात कहो ताकि मैं झगडे का कारण जान सकूं और तुम दोनों को न्याय दे सकूं। जय सियाराम।”

वे दोनों भगतिन बिल्ली के बिलकुल निकट आ गए ताकि उसके कानों में अपनी-अपनी बात कह सकें। बिल्ली को इसी अवसर की तलाश थी उसने ‘म्याऊं’ की आवाज लगाई और एक ही झपट्टे में खरगोश और चकोर का काम तमाम कर दिया। फिर वह आराम से उन्हें खाने लगी।

वे दोनों भगतिन बिल्ली के बिलकुल निकट आ गए ताकि उसके कानों में अपनी-अपनी बात कह सकें। बिल्ली को इसी अवसर की तलाश थी उसने ‘म्याऊं’ की आवाज लगाई और एक ही झपट्टे में खरगोश और चकोर का काम तमाम कर दिया। फिर वह आराम से उन्हें खाने लगी।

सीखः दो के झगडे में तीसरे का ही फायदा होता हैं, इसलिए झगडों से दूर रहो।

Saturday, 4 August 2018

August 04, 2018

Tenali raman


तेनालीरामा -> सन्तुष्ट व्यक्ति के लिए उपहार
 तेनालीरामा -> सन्तुष्ट व्यक्ति के लिए उपहार तेनालीरामा -> सन्तुष्ट व्यक्ति के लिए उपहार
 एक दिन तेनाली राम बडी प्रसन्न मुद्रा में दरबार में आया। उसने बहुत अच्छे कपडे और गहने पहन रखे थे। उसे देख् कर राजा कॄष्णदेव राय बोले, “तेनाली, आज तुम बहुत प्रसन्न दीखाई दे रहे हो। क्या बात है?”
“महाराज कोई खास बात नहीं है।” तेनाली राम प्यार से बोला।

“नहीं आज मुझे तुम कुछ अलग लग रहे हो। वैसे एक बात है, जब तुम मुझे पहली बार मिले थे, तब तुम्हारा व्यक्तित्व बहुत साधारण था।”

तेनाली राम बोला, “महाराज, प्रत्येक व्यक्ति समय के साथ बदलता है। विशेषतः जब उसके पास थोडा बहुत धन भी हो। मैंने आपके द्वारा दिए गए उपहारों से काफी बचत कर ली है।”

राजा बोले, “तब तो तुम्हें अपनी बचत का कुछ भाग दूसरों को भी देना चाहिए।”

तेनाली राम बोला, “महाराज, अभी मैंने दूसरों को देने के लायक पर्याप्त बचत नहीं की है।”

यह सुनकर राजा ने तेनाली राम की दान न करने की प्रवॄति कि लिए उसे काफी लताडा। तेनाली राम ने जब देखा कि उसकी बात का राजा बुरा मान गए हैं तो उसने अपनी गलती स्वीकारकरते हुए महाराज से पूछा कि उसे क्या दान करना चाहिए।

” तेनाली, तुम एक भ्व्य घर बनवाओ और उसे दान दो, इससे तुम्हें प्रसन्न्ता होगी।” राजा ने कहा ।

तेनाली राम ने राजा की बात मान ली। अगले कुछ माह तक वह एक भ्व्य मकान बनवाने में व्यस्त हो गया। जब वह भ्व्य मकान बनकर तैयार हो गया तो तेनाली राम ने मकान के उपर एक तख्ती टॉग दी, जिस पर लिखा था, “यह घर उस व्यक्ति को दिया जाएगा, जो अपने जीवन में मात्र उतने में ही प्रसन्नता महसूस करता हो, जितना उसके पास है।”

कई लोगो ने उस तख्ती को पढा, परन्तु कोई भी मकान लेने नहीं आया। एक बार एक निर्धन व्यक्ति को उस घर के बारे में पता चला। उसने सोचा कि क्यों न वह उस मकान को प्राप्त करने की कोशिश करे। यह सोचकर वह तेनाली के घर पहुँचा उसने बाहर लगी त्ख्ती को बार-बार पढा। उसने सोचा सोचा कि लोग कितने मूर्ख हैं, जो इस मकान को लेने नहीं आ रहे। वह घर में गया और बोल, ” श्रीमान, मैंने घर के बाहर टँगी तख्ती को पढा हैं, मैं दावा करता हूँ कि मैं सबसे प्रसन्न व संतुष्ट व्यक्ति हूँ। अतः मैं इस मकान का अधिकारी हूँ।”

इस पर तेनाली राम हँसने और बोला, “यदि इस घर के बिना तुम प्रसन्न और संतुष्ट हो, तो फिर तुम्हें इस घर की क्या आवश्यकता है? और यदि तुम्हें आवश्यकता है तो फिर तुम्हारा दावा गलत है। क्योंकि अगर जो कुछ तुम्हारे पास है तुम उससे संतुष्ट हो, तो तुम इसे क्यों मॉगोगे?”

निर्धन व्यक्ति को अपनी भूल का आभास हो गया। उसके बाद उस मकान को मॉगने के लिए कोई नही आया। अन्त में तेनाली राम ने सारी कथा राजा को सुनाई। राजा बोले, “तुमने एक बार फिर अपनी बुद्धिमानी का परिचय दिया। परन्तु अब तुम उस मकान का क्या करोगे?”

“कोई शुभ दिन देखकर मैं उसमें गॄह-प्रवेश करुँगा।’ इस प्रकार एक बार फिर तेनाली राम ने राजा कॄष्णदेव राय को निरुत्तर कर दिया।

 https://skcreaters.blogspot.com